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आपराधिक मानव वध क्या है? इसमें और हत्या में अंतर (BNS के अनुसार) व सजा के प्रावधान

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जब किसी इंसान के हाथों दूसरे इंसान की जान जाती है, तो कानूनी दुनिया में उसे केवल "मर्डर" या "हत्या" नहीं कह दिया जाता। भारतीय आपराधिक कानून में इसे समझने के लिए दो बेहद महत्वपूर्ण और अक्सर भ्रमित करने वाले शब्दों का उपयोग किया जाता है— आपराधिक मानव वध (Culpable Homicide) और हत्या (Murder) । सदियों से चली आ रही भारतीय दंड संहिता (IPC) की जगह अब देश में नया कानून भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू हो चुका है [100.1, 101.1]। ऐसे में यह समझना और भी जरूरी हो गया है कि नए कानून के दायरे में अपराध के चार तत्व क्या हैं और कोई कृत्य कब आपराधिक मानव वध की श्रेणी में आता है और कब वह हत्या का गंभीर रूप ले लेता है। कानूनी समझ को आसान भाषा में कहें तो, "सभी हत्याएं आपराधिक मानव वध होती हैं, लेकिन सभी आपराधिक मानव वध हत्या नहीं होते।" इस लेख में हम बेहद सरल शब्दों में समझेंगे कि आपराधिक मानव वध की परिभाषा क्या है, इसमें सजा का क्या प्रावधान है, और माननीय सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क फैसलों के अनुसार इन दोनों के बीच की वो बारीक कानूनी रेखा कौन सी है जो एक आरोपी को फांसी के...

गिरफ्तारी के समय गिरफ्तारी का लिखित कारण (Grounds of arrest) बताए बिना गिरफ्तारी अवैध, पुनः गिरफ्तारी के लिए न्यायालय की अनुमति जरूरी : सुप्रीम कोर्ट ( 2026)

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  हाल ही में 21 सितंबर 2026 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने जसकरन जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य (2026) मामले में पुलिस की मनमानी गिरफ्तारी पर रोक लगाने के लिए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है: पुलिस की निरंकुशता और मनमाने आचरण को नियंत्रित करने के लिए तथा मनमाने ढंग से गिरफ्तारी और हिरासत में  रखने से नागरिकों को संरक्षित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर आवश्यक दिशा निर्देश जारी किए जाते रहे हैं, जिसमें डी.के. बसु बनाम स्टेट ऑफ़ बंगाल (1997),ISCC 416 के मामले में जारी दिशा-निर्देश सबसे अहम और गिरफ्तारी प्रक्रिया की पारदर्शिता एवं वैधानिकता को बनाए रखने की दिशा में मील का पत्थर माना जाता है। नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 के लागू होने के बाद इस दिशा में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिनांक 21.9.2026 को  जसकरन जीत सिंह बनाम पंजाब राज्य (2026)   के मामले में एक अहम फैसला सुनाया गया जिसमें पूर्व में जारी किए गए दिशा निर्देशों को और अधिक स्पष्ट एवं बाध्यकारी बना दिया गया। आइये   'कानून आज तक' के इस विशेष लेख में जानते हैं, इस अहम मामले की पृष्ठभूमि कोर...

लिव - इन रिलेशनशिप (live in relationship) पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला 2026: बिना शादी भी महिलाओं को मिलेंगे ये कानूनी अधिकार

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  बीते दशक में बदलते भारतीय समाज के साथ देश में लिव -इन रिलेशनशिप (बिना शादी के साथ पति-पत्नी की तरह रहना) का चलन तेजी से बढ़ा है। समय-समय पर ऐसे जोड़ों के बीच आपसी विवाद होने पर अक्सर यह विधिक प्रश्न उठता है कि क्या बिना शादी के साथ रहने वाली महिला को भी विधि अनुसार विवाहित शादीशुदा महिलाओं की तरह कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए ? देश की सर्वोच्च अदालत (supreme court of India) ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि शादी न होने के बावजूद  लिव -इन पार्टनर को कानूनी संरक्षण और अधिकार प्राप्त होंगे। आइए 'कानून आज तक'के इस विशेष लेख में आसान भाषा में समझते हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह नया फैसला क्या है और इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगें। माननीय सर्वोच्च न्यायालय की डिवीजन बेंच जस्टिस संजय करोल (justice Sanjay Karol) और जस्टिस एन के सिंह (justice N.K. Singh) द्वारा लोकेश बी.एच. बनाम कर्नाटक राज्य (Lokesh B.H. vs state of Karnataka)  के मामले में 3 अगस्त 2026 को माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसने लिव -इन रिलेशनशिप में रहने वाली महिलाओं के वि...

Zero FIR क्या है? जानिए नए कानून (BNSS) में इसके नियम और आम जनता के अधिकार

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जब भी समाज में कोई गंभीर अपराध या दुर्घटना होती है, तो पीड़ित व्यक्ति को न्याय दिलाने के लिए सबसे पहला कदम होता है---पुलिस थाने में एफआईआर (FIR) दर्ज कराना। लेकिन अक्सर देखने को मिलता है कि जब कोई पीड़ित पुलिस स्टेशन जाता है, तो पुलिस यह कहकर एफआईआर(FIR) दर्ज नहीं करती है कि "यह घटना हमारे इलाके (jurisdiction) की नहीं है, आप संबंधित थाने में जाइए।" ऐसी स्थिति में पीड़ित का कीमती समय बर्बाद होता है और कई बार सबूत भी नष्ट हो जाते हैं। इसी समस्या को दूर करने के लिए कानून  में जीरो एफआईआर (Zero FIR) का प्रावधान किया गया है। आइए 'कानून आज तक'के इस लेख में आसान भाषा में समझते हैं कि जीरो एफआईआर क्या है? नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 (BNSS)   में इसे लेकर क्या बड़े बदलाव हुए हैं। जीरो एफआईआर(Zero FIR)क्या है ? साधारण शब्दों में कहें तो, जब किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable offence) , जैसे बलात्कार, हत्या, गंभीर मार-पीट, चोरी आदि) की शिकायत किसी ऐसे पुलिस स्टेशन में की जाती है, जिसके अधिकार क्षेत्र (jurisdiction) में वह अपराध नहीं हुआ है, तब भी पुलिस को वह शिकायत द...

Dying Declaration in BSA: नए कानून में मृत्युकालिक कथन के नियम और शर्तें

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भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 के तहत मृत्युकालिक कथन के मुख्य नियम अपराधिक न्याय प्रणाली(criminal justice system) मैं कुछ सबूत ऐसे होते हैं, जो किसी उलझे हुए मामले का रुख पूरी तरह बदल देते हैं। इन्हीं में से एक सबसे महत्वपूर्ण और अचूक साक्ष्य है - मृत्युकालिक कथन (dying declaration)। आमतौर पर अदालत के सामने दिया गया बयान ही सबूत माना जाता है, लेकिन मृत्युकालिक कथन कानून का एक ऐसा अपवाद है जहां मरने वाले व्यक्ति के अंतिम शब्द ही आरोपी को सजा दिलाने का सबसे बड़ा आधार बन जाते हैं। आइए 'कानून आज तक' के इस विशेष लेख में समझते हैं कि नए पुराने कानूनों के तहत मृत्युकालिक कथन का क्या महत्व है और देश की शीर्ष अदालत (supreme court) का इस पर क्या रुख है?  1.मृत्युकालिक कथन का कानूनी आधार:  भारतीय साक्ष्य विधि में हाल ही में हुए बड़े बदलावों के बाद इसकी धाराओं में परिवर्तन आया है।  .पुराने कानून (Indian evidence act ,1872): पुराने कानून में मृत्युकालिक कथन (dying declaration) धारा 32 (1) के तहत परिभाषित किया गया था। . नए कानून (Bhartiya sakshya adhiniyam 2023- BSA):   नए कानू...

Firozabad Shikohabad Arav Murder Case: मासूम आरव के कातिल को 41 दिन में मिली फांसी की सजा, जानें कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

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  उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले की जिला एवं सत्र न्यायालय ने न्याय की एक ऐसी मिसाल पेश की है, जिसकी चर्चा पूरे देश में हो रही है। शिकोहाबाद के बहुचर्चित और रूह कंपा देने वाले मासूम आरव हत्याकांड में अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दोषी विराज उर्फ जितेंद्र पाठक को फांसी की सजा (Death Penalty) सुनाई है। जिला जज डॉ. बब्बू सारंग की अदालत ने इस क्रूरतम अपराध को "दुर्लभ से दुर्लभतम" (Rarest of Rare) श्रेणी का माना है। सबसे बड़ी बात यह है कि पुलिस की मुस्तैदी और कोर्ट की प्राथमिकता के कारण घटना के महज 41 दिनों के भीतर दोषी को अंजाम तक पहुंचा दिया गया। आइए जानते हैं क्या था यह पूरा मामला और कोर्ट रूम में सजा सुनने के बाद क्या हुआ। क्या था शिकोहाबाद का आरव हत्याकांड? (The Complete Case): यह पूरी घटना 30 मई 2026 को शिकोहाबाद की यादव कॉलोनी में घटित हुई थी। मुख्य आरोपी विराज (निवासी बदायूं) अपनी रिश्ते की भाभी (रति शर्मा) पर एकतरफा प्यार में शादी करने का दबाव बना रहा था। जब महिला ने उसके इस अनुचित प्रस्ताव को ठुकरा दिया, तो विराज ने प्रतिशोध लेने की ठानी। उसने महिला के डेढ़ स...