पारिवारिक न्यायालय, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 (B) के अंतर्गत तलाक की याचिका के लिए विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र अनिवार्य नहीं : हाई कोर्ट इलाहाबाद
हिंदू विवाह केवल पंजीकरण न होने से अमान्य नहीं हो जाता :-
इलाहाबाद उच्च न्यायलय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह निर्धारित किया कि कोई हिंदू विवाह केवल इसलिए अमान्य नहीं हो जाता क्योंकि वह पंजीकृत नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि :-
सुनील दुबे और मीनाक्षी का विवाह जून 2010 में हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार संपन्न हुआ था। पति पत्नी द्वारा 23 अक्टूबर 2024 को आपसी सहमति से तलाक के लिए हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(B) के अंतर्गत संयुक्त रूप से एक याचिका दाखिल की। कार्यवाही के दौरान, इलाहाबाद के पारिवारिक न्यायालय ने उन्हें अपना विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र दाखिल करने का निर्देश दिया, जबकि उनके विवाह का पंजीकरण नहीं हुआ था,इसलिए वे विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र दाखिल करने में असमर्थ रहे।
याचिका कर्ता द्वारा पंजीकरण प्रमाण पत्र संलग्न करने से छूट के लिए आवेदन दाखिल किया। याचिका कर्ता के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क दिया गया कि हिंदू विवाह अधिनियम,1955 के तहत विवाह पंजीकरण कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है। मीनाक्षी द्वारा इस तर्क का समर्थन किया गया। इसके बावजूद, पारिवारिक न्यायालय ने हिंदू विवाह एवं तलाक नियम, 1956 के नियम 3(a) का हवाला देते हुए आवेदन खारिज कर दिया।
पारिवारिक न्यायालय के इस आदेश से व्यथित होकर याचिका कर्ता ने उच्च न्यायालय में याचिका दाखिल किया और यह कथन किया कि हमारी शादी 2010 में हुई थी, उस समय उत्तर-प्रदेश विवाह पंजीकरण नियम, 2017 प्रभावी नहीं था। याचिका कर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने यह तर्क दिया कि हिंदू विवाह अधनियम, 1955 की धारा 8, केवल राज्य सरकारों को विवाह पंजीकरण के लिए नियम बनाने का अधिकार देती है, लेकिन उप धारा (5) में स्पष्ट रूप से यह कहा गया कि पंजीकरण में विफलता विवाह की वैधता को प्रभावित नहीं करती है।
उच्च न्यायालय द्वारा कानूनी संदर्भ की व्याख्या :-
प्रस्तुत मामले की सुनवाई कर रहे न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, विवाह की वैधता के लिए पंजीकरण को अनिवार्य नहीं बनाता। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 8(1) राज्य सरकारों को विवाह पंजीकरण के लिए नियम बनाने का अधिकार देती है, और ऐसा पंजीकरण केवल सुविधाजनक साक्ष्य के रूप में कार्य करता है, न कि कानूनी वैधता की पूर्व शर्त है। न्यायालय ने धारा 8(5) के शब्दों पर बल दिया, जिसमें कहा गया कि विवाह पंजीकरण न होने से उसकी वैधता प्रभावित नहीं होगी।
उत्तर-प्रदेश विवाह पंजीकरण नियम, 2017 और उसका प्रभाव :-
न्यायालय द्वारा यह कहा गया कि उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली, 2017 में स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि यदि नियमावली के प्रभावी होने से पहले या बाद में विवाह का पंजीकरण नहीं भी कराया जाता है, तो भी ऐसे विवाह की वैधता प्रभावित नहीं होगी। न्यायालय ने कहा कि 1956 की नियमावली के नियम 3(a) की आवश्यकता केवल तभी लागू होती है जब विवाह पहले ही पंजीकृत हो चुका है। जबकि सुनील दुबे एवं मीनाक्षी का विवाह कभी पंजीकृत ही नहीं हुआ था, इसलिए प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने की कोई बाध्यता नहीं थी।
उच्च न्यायालय का निर्णय :-
मामले के सभी बिंदुओं का अवलोकन करने के बाद, न्यायालय ने माना कि विवाह पंजीकरण प्रमाण-पत्र पर पारिवारिक न्यायालय का बल देना पूरी तरह अनुचित था। उच्च न्यायालय ने विवादित आदेश को निरस्त कर दिया और सुनील दुबे द्वारा दाखिल छूट आवेदन-पत्र को स्वीकार कर लिया। यह निर्णय सुनिश्चित करता है कि केवल पंजीकरण न होने के कारण, हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत किसी हिंदू विवाह के पक्षकारों को उनके विधिक उपायों से वंचित नहीं किया जाएगा।
याचिका कर्ता बनाम प्रतिवादी
सुनील दुबे बनाम मीनाक्षी

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