B.N.S.S.के लागू होने के बाद गंभीर अपराध में भी अग्रिम जमानत संभव




      मामले की पृष्ठभूमि 

बरेली जिले के थाना देवरनिया, उत्तर प्रदेश में एक प्रथम सूचना रिपोर्ट 647 / 2011 पंजीकृत कराई गई। जिसमें आरोप लगाया गया था कि अब्दुल हमीद व अन्य आरोपीगण जावेद अनवर, अनवर जमीर व बाबू के साथ लाइसेंसी पिस्तौल से लैस होकर शिकायतकर्ता एवं उसके परिवार के सदस्यों पर हमला किया।F.I.R. मैं आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने अंधाधुंध गोलीबारी की, जिसके परिणाम स्वरूप गुड्डू उर्फ जाकिर हुसैन, शिकायतकर्ता के चाचा की गोली लगने से मौत हो गई। हत्या का कारण पंचायत चुनाव और ठेकेदारी संबंधी विवादों से उपजी पूर्व रंजिश बताया गया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में एक गोली का घाव के साथ अंदर और बाहर निकालने के घाव पाए गए। 

पुलिस द्वारा जांच की गई और 7. 11.2011 को तीन आरोपियों (जावेद अनवर, अनवर जमीर व बाबू) के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल किया गया। उल्लेखनीय है कि अब्दुल हमीद के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल नहीं किया गया क्योंकि जांच अधिकारी ने उसके विरुद्ध आरोपों को झूठा पाया। गांव के लोगों ने हलफनामे प्रस्तुत किये जिसमें कहा गया कि अब्दुल हमीद घटनास्थल पर मौजूद नहीं था।

मामले का विचारण शुरू हुआ जिसमें pw1 ने अब्दुल हमीद को भी घटना में शामिल बताया और गोली चलाने की बात बताई। इस बयान के आधार पर अब्दुल हमीद को अतिरिक्त आरोपों के रूप में बुलाने के लिए सीआरपीसी की धारा 319 के तहत एक आवेदन दाखिल किया गया। विद्वान अतिरिक्त न्यायाधीश कोर्ट नंबर 3, बरेली ने 22. 5.2019 को आवेदन स्वीकार कर लिया और आवेदक को मुकदमे में विचरण के लिए समन द्वारा बुलाया गया।

आवेदक ने माननीय उच्च न्यायालय की समन्वय पीठ के समक्ष सीआरपीसी की धारा 438 में अपनी पहली अग्रिम जमानत याचिका संख्या 1554/2023 प्रस्तुत की, जिसे सीआरपीसी की धारा 438 (6) के तहत वर्जित होने के कारण 10. 2 .2023 को खारिज कर दिया गया(क्योंकि आईपीसी की धारा 302 के तहत मृत्युदंड तक की सजा का प्रावधान है इसलिए स्वीकार्य योग्य नहीं है।)
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023( B.N.S.) के अधिनियमित होने के बाद आवेदक द्वारा सत्र न्यायाधीश बरेली के समक्ष B.N.S. की धारा 482 के तहत अग्रिम जमानत आवेदन प्रस्तुत किया, जिसे 10 .3.2025 को खारिज कर दिया गया। 

इसके बाद आवेदक ने उच्च न्यायालय B.N.S. की धारा 482 के अंतर्गत विविध द्वितीय अग्रिम जमानत याचिका 2765/ 2025 प्रस्तुत किया, जिसमें आवेदक की ओर से निम्नलिखित आधार प्रस्तुत किए गए 

1. याचिका कर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि घायल गवाहों जमीउल हसन और जाकिर अली ने अपने बयान में आवेदक का नाम नहीं लिया। घायल गवाहों के बयानों के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि आवेदक ना तो घटना के समय उपस्थित था ना ही कथित घटना का हिस्सा था। जांच अधिकारी ने आवेदक के विरुद्ध आरोपी को झूठा पाया इसलिए आवेदक के विरुद्ध आरोप पत्र दायर नहीं किया ।

2. प्रथम सूचना रिपोर्ट और शिकायतकर्ता के बयान में ऐसा कोई विशिष्ट आरोप नहीं है कि आवेदक ने कोई हमला किया था। मृतक को एक ही गोली लगी थी, जिसमें एक अंदर और एक बाहर जाने वाला घाव था। विचारण के दौरान दर्ज साक्ष्य, मामले की जांच के समय Cr.P.C. की धारा 161 के तहत पहले से मौजूद बयान के अतिरिक्त कोई नए साक्ष्य नहीं थे। इस प्रकार विद्वान अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष कोई नया साक्ष्य नहीं था, जिसके आधार पर आवेदक को Cr.P.C. की धारा 319 के तहत तलब कर सके। 

3. यह  भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि आवेदक ने जब इससे पहले अपनी अग्रिम जमानत याचिका प्रस्तुत की थी लेकिन सीआरपीसी की धारा 438 (6) के तहत अस्वीकार कर दिया गया था। 1.7.24  B.N.S. के अधिनियमित होने के बाद, आवेदक का अग्रिम जमानत याचिका दाखिल करने का अधिकार मान्य है क्योंकि B.N.S. की धारा 482 (4) के तहत ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। इसके अलावा, B.N.S. की धारा 482 के प्रावधानों में संशोधन करने वाला कोई राज्य संशोधन लागू नहीं किया गया है। 

4. अनुराग दुबे बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते यह  भी तर्क प्रस्तुत किया गया कि माननीय न्यायालय की समन्वय पीठ ने यह माना है कि बदली हुई परिस्थितियों में अगली अग्रिम जमानत याचिका दाखिल की जा सकती है।

           विचारणीय विधिक बिंदु

क्या प्रथम अग्रिम जमानत याचिका जो गंभीर अपराधों में सीआरपीसी की धारा 438 (6) के द्वारा बाधित होने के कारण खारिज कर दी गई थी, उसी मामले में द्वितीय अग्रिम जमानत याचिका 1.7.2024 के बाद, B.N.S. के अधिनियमित होने के बाद स्वीकार है? 

                         निष्कर्ष 

माननीय न्यायालय द्वारा यह स्पष्ट किया गया कि B.N.S. के तहत वर्तमान में दूसरी अग्रिम जमानत याचिका स्पष्ट रूप से स्वीकार्य है। ब B.N.S. के अधिनियमन ने विधि और तथ्य दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण रूप से परिवर्तित परिस्थितियां उत्पन्न की है, जो गुण दोष के आधार पर नए सिरे से विचार करने को उचित ठहराती है। Cr.P.C. की धारा 438 ( 6) मैं निहित वैधानिक बाधा को हटाना कानूनी ढांचे में एक मूलभूत परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करता है जो उसे आधार को नष्ट कर देता है जिस पर पहला आवेदन  अस्वीकार किया गया था। लाभकारी विधान का सिद्धांत और प्रक्रियात्मक कानून के पूर्वव्यापी अनुप्रयोग के पक्ष में पूर्व धरना आवेदन के मामले का दृढ़ता से समर्थन करती है। आवेदक का कथित अपराध चाहे किसी भी समय किया गया हो, B.N.S. द्वारा लागू किए गए अधिक उदार प्रावधानों का लाभ पाने का हकदार हैं।
कथित अपराध में उसकी गौण भूमिका, जांच के दौरान विश्वसनीय साक्ष्यों का अभाव, जैसा कि आरोप पत्र में उसका नाम शामिल न होने से स्पष्ट है, उसकी वृद्धावस्था और चिकित्सीय स्थिति तथा कार्यवाही में हुई पर्याप्त देरी को देखते हुए आवेदक का मामला जमानत योग्य पर्याप्त आधारों से युक्त है और स्वीकार करने योग्य है अतः जमानत स्वीकार की जाती है।

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