अन्यत्र उपस्थिति (Plea of Alibi) क्या है? जानिए कानून में अन्यत्र उपस्थिति का यह महत्वपूर्ण सिद्धांत
अन्यत्र उपस्थिति (Plea of Alibi) सिद्धांत क्या है? इसका इस्तेमाल कैसे किया जाता है?
जब भी किसी व्यक्ति पर कोई अपराध करने का आरोप लगता है, तो अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए उसके पास कई कानूनी रास्ते होते हैं। इन्ही रास्तों में से एक सबसे मजबूत और महत्वपूर्ण कानूनी बचाव है-- अन्यत्र उपस्थिति (Plea of Alibi); जिसे हिंदी में अन्यत्र उपस्थिति का सिद्धांत कहा जाता है।
आपराधिक कानून (criminal law) में यह एक ऐसा हथियार है, जो अगर सही तरीके से इस्तेमाल किया, तो आरोपी को पूरी तरह बरी करा सकता है। आइए 'कानून आज तक'के इस लेख में आसान भाषा में समझते हैं कि प्ली ऑफ ऐलीबाई क्या है और भारतीय कानून में इसके क्या नियम है।
प्ली ऑफ ऐलीबाई(Plea of Alibi) का क्या मतलब है?
'ऐलीबाई' एक लैटिन शब्द है, जिसका अर्थ होता है कहीं और (Elsewhere)
कानूनी रूप से जब किसी आरोपी पर कोई अपराध करने का आरोप लगाया जाता है, और वह अदालत में यह दावा करता है कि "जिस समय और जिस स्थान पर अपराध हुआ था, वह वहॉ मौजूद नहीं था, बल्कि किसी दूसरी जगह पर था,"तो आरोपी द्वारा लिए गए इस बचाव प्ली ऑफ ऐलीबाई (Plea of Alibi)/अन्यत्र उपस्थिति कहा जाता है।
सरल शब्दों में, यदि कोई व्यक्ति यह साबित कर दे कि घटना के समय वह अपराध स्थल से इतनी दूर था कि वहां पहुंचकर अपराध करना नामुमकिन था, तो उसे इस सिद्धांत का लाभ मिलता है।
भारतीय कानून में इसका क्या प्रावधान है?
भारतीय कानून में ' प्ली ऑफ ऐलीबाई' का सीधा ज़िक्र किसी धारा में नहीं है लेकिन इसका मुख्य आधार भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की धारा 11 और नए कानून भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 9 मैं यह प्रावधान है कि 'वे तथ्य जो अन्यथा सुसंगत नहीं है कब सुसंगत हैं--
(1) यदि वे किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य से असंगत हैं;
(2) यदि वे स्वयंमेव या अन्य तथ्यों के संसर्ग में किसी विवाद्यक तथ्य या सुसंगत तथ्य का अस्तित्व या अनस्तित्व अत्यंत अधिसंभाव्य या अनाधिसंभाव्य बनाते हैं।"
सरल शब्दों में वे तथ्य भी सुसंगत (Relevant) होते हैं , जो अन्य सुसंगत तथ्यों से पूरी तरह असंगत हो--
उदाहरण: अगर A पर आप है कि उसने दिल्ली में रात 10:00 बजे मर्डर किया, और A कोर्ट में साबित कर दे कि वह उस रात 10:00 बजे मुंबई के एक लाइव शो में मौजूद था। दिल्ली और मुंबई की दूरी इतनी है कि एक ही समय पर दोनों जगह होना असंभव है। यह तथ्य आरोप से पूरी तरह असंगत है।
प्ली ऑफ ऐलीबाई को साबित करने की जिम्मेदारी किसकी है?
कानून का एक सामान्य नियम है कि किसी भी मामले में आरोपी को तब तक बेगुनाह माना जाता है जब तक कि अभियोजन पक्ष उसका गुनाह साबित न कर दे। लेकिन प्ली ऑफ ऐलीबाई के मामले में यह नियम थोड़ा बदल जाता है।
• भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872/भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 की धारा 103/धारा 106 के अनुसार, अन्यत्र उपस्थिति (alibi) को साबित करने का पूरा भार( burden of proof ) आरोपी पर होता है।
• कोर्ट में पहले सरकारी वकील को यह साबित करना होगा कि आरोपी ने अपराध किया है।
• इसके बाद, आरोपी को ठोस सबूतों के साथ यह साबित करना होगा कि वह घटना के समय किसी अन्य स्थान पर था।
ऐलीबाई को साबित करने के मुख्य सबूत क्या हो सकते हैं?
मुंह से कह देने भर से अदालत अन्यत्र उपस्थिति के दावे को स्वीकार नहीं करती इसके लिए आरोपी को अकाट्य सबूत (Irrefutable evidence) देने होते हैं, जैसे:-
• सीसीटीवी फुटेज (CCTV FOOTAGE):-
घटना के समय आरोपी किसी अन्य दुकान, ऑफिस या सार्वजनिक स्थान के कैमरे में कैद हुआ हो।
• कॉल डिटेल और लोकेशन (CDR& LOCATION):-
मोबाइल टावर लोकेशन से यह साफ हो कि वह अपराध स्थल से बहुत दूर था।
•टिकट और ट्रैवल हिस्ट्री (tickets & travel history):-
उस समय के हवाई जहाज, ट्रेन या बस के टिकट और बोर्डिंग पास।
• बायोमेट्रिक हाजिरी (biometric attendance):-
ऑफिस या कॉलेज मैं अंगूठे या फेस डिटेक्शन से लगी उपस्थिति।
• विश्वसनीय गवाह (credible witnesses):-
कोई प्रतिष्ठित या निष्पक्ष व्यक्ति कोर्ट में आकर यह गवाही दे कि आरोपी उसे समय उसके साथ था।
सुप्रीम कोर्ट के महत्त्वपूर्ण दिशा निर्देश:-
माननीय सर्वोच्च न्यायालय (supreme court) ने कई फैसलों में
यह साफ किया कि प्ली ऑफ ऐलीबाई का दावा कब और कैसे किया जाना चाहिए
1. शुरुआती स्टेज पर दावा:
आरोपी को केस के शुरुआत म ही(F.I.R. या चार्जसीट के तुरंत बाद या कोर्ट में पहली पेशी के दौरान) यह बताना चाहिए कि वह वहां नहीं था। देरी से किया गया दावा संदेहास्पद माना जाता है।
2. सटीकता जरूरी:
आरोपी को बिल्कुल सटीक समय और स्थान की जानकारी देनी होती है।
3. झूठा दावा भारी पड़ सकता है?
अगर आरोपी ऐलीबाई का झूठा दावा करता है और उसे साबित करने में नाकाम रहता है, तो कोर्ट उसके खिलाफ नकारात्मक बिंदु (adverse inference) मान सकती हैं।
प्ली ऑफ ऐलीबाई से संबंधित महत्वपूर्ण केस लॉ:-
1. दूधनाथ पांडेय बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (dudhnath Pandey vs state of UP 1981)
• महत्वपूर्ण सिद्धांत:-
न्यायालय में इस मामले ने साफ किया था कि प्ली ऑफ ऐलीबाई को सिर्फ एक 'संभावना' के तौर पर नहीं, बल्कि पुरी निश्चितता (certainity) के साथ साबित करना होगा।
• कोर्ट की टिप्पणी:-
आरोपी को यह साबित करना होगा कि वह अपराध के समय घटना स्थल से इतनी दूर था कि उसका वहां पहुंचना पूरी तरह से नामुमकिन था, महज कुछ दूरी पर होने का बहाना ऐलीबाई नहीं माना जाएगा।
2. विनय कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (Vinay Kumar Singh vs state of Bihar1997)
• महत्वपूर्ण सिद्धांत:-
इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 'ऐलीबाई' शब्द को परिभाषित किया था।
• कोर्ट की टिप्पणी:-
ऐलीबाई एक लैटिन शब्द है जिसका मतलब है"कहीं और"यह भारतीय दंड संहिता का कोई सामान्य अपवाद (general exception) नहीं है, बल्कि यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 11 के तहत साक्ष्य का एक नियम है।
3. पप्पू तिवारी बनाम झारखंड राज्य (Pappu Tiwari vs state of Jharkhand 2022)
• महत्वपूर्ण सिद्धांत:-
इस केस में अदालत ने आरोपी पर होने वाले सबूत के भारी बोझ (heavy burden of proof) का उल्लेख किया कया है।
• कोर्ट की टिप्पणी:-
जस्टिस संजय किशन कौल की पीठ ने कहा था की ऐलीबाई की याचिका को साबित करने का भार पूरी तरह आरोपी पर होता है। आरोपी को इसे इतना पुख्ता तरीके से साबित करना होगा ताकि घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी की संभावना पूरी तरह से खत्म हो जाए।
निष्कर्ष:-
प्ली ऑफ ऐलीबाई या अन्यत्र उपस्थिति का सिद्धांत किसी भी निर्दोष व्यक्ति को झूठे मामले में फॅसाने से बचाने का एक बेहद मजबूत माध्यम है। हालांकि इसे साबित करने की कानूनी कसौटी बहुत सख्त होती है। कोर्ट इसे तभी मानती है जब आरोपी की दूसरी जगह मौजूदगी को लेकर रत्ती भर भी संदेह न बचे।

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